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उस एक दिन की आस

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  उस एक दिन की आस          रेत सा फिसलता वक़्त और मैं, उन लम्हों के कुछ  पन्ने पीछे छूटते गए और मैं चल पड़ी आगे की ओर। वक़्त वक़्त गुजरता गया मैं भी चलती रही वक़्त के साथ, ख़ुद  ही को समझाते हुए। मेरे भीतर एक द्वंद चलता रहा, मेरे और हालातों के बीच...         मैं सोचती क्या कभी संघर्षों पर विराम लग पाएगा, फिर ख़ुद ही को तसल्ली देती  "हाँ" एक दिन जरूर। पर "उस एक दिन की आस में"  अब तक जी रही हूँ मैं।        "जीवन के अनुभव ने यह तो सीखा दिया कि जहां  उम्मीद हो, दर्द वहीं उत्पन्न होता है। अब प्रश्न उठता है कि क्या हम उम्मीद करना छोड़ दें ?  बिल्कुल भी नही - हम  उम्मीद करें अपने आप से, हममें वो आत्मविश्वास उत्पन्न  हो कि हम बेहतर हैं और बेहतर कर सकते हैं।  हमारे  भीतर ही आशा व निराशा है, गम और खुशी है। हम बाहर खुशी की तलाश में भटकते रहते हैं परंतु कभी ख़ुद को तलाशने की रत्ती मात्र कोशिश भी नही की, जिस  दिन हम अपने को तलाश लेंगे, ख़ुद को ख़ुद से मिलवा देंगे , तब हमें परम सुख क...

एहसास

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            ख़ुद   ही में एक एहसास हूँ ख़ुद ही में एक एहसास हूँ, हां मैं अधूरी सी प्यास हूँ। संघर्षों की, ग़म की, खुशियों की भीड़ की तो कभी तन्हाई की वो छलकते आंसुओं की हां मैं अधूरी सी प्यास हूँ ख़ुद ही में एक एहसास हूँ रेत सी फ़िसलती आरज़ुओं की हृदय में दबी भावनाओं की वो अनकही दास्तानों की  हां मैं अधूरी सी प्यास हूँ ख़ुद ही में एक एहसास हूँ वीरानों के उदासी की जज़्बातों के रवानी की वो शोर मचाते ख़ामोशी की हां मैं अधूरी सी प्यास हूँ ख़ुद ही में एक एहसास हूँ रूह तक भीगी दुआओं की दिल मे उठे तूफानों की वो अनसुनी आवाज़ों की हां मैं अधूरी सी प्यास हूँ ख़ुद ही में एक एहसास हूँ सागर के गहराई की उन तपते शिलाओं की वो अनछुए लम्हात की  हां मैं अधूरी सी प्यास हूँ, ख़ुद ही में एक एहसास हूँ।                          -©पूर्णिमा तिवारी                        ब्लॉगर