उस एक दिन की आस

  उस एक दिन की आस





         रेत सा फिसलता वक़्त और मैं, उन लम्हों के कुछ 

पन्ने पीछे छूटते गए और मैं चल पड़ी आगे की ओर। वक़्त

वक़्त गुजरता गया मैं भी चलती रही वक़्त के साथ, ख़ुद

 ही को समझाते हुए। मेरे भीतर एक द्वंद चलता रहा,

मेरे और हालातों के बीच...

        मैं सोचती क्या कभी संघर्षों पर विराम लग पाएगा,

फिर ख़ुद ही को तसल्ली देती  "हाँ" एक दिन जरूर।

पर "उस एक दिन की आस में"  अब तक जी रही हूँ मैं।

       "जीवन के अनुभव ने यह तो सीखा दिया कि जहां

 उम्मीद हो, दर्द वहीं उत्पन्न होता है। अब प्रश्न उठता है कि

क्या हम उम्मीद करना छोड़ दें ?  बिल्कुल भी नही - हम 

उम्मीद करें अपने आप से, हममें वो आत्मविश्वास उत्पन्न 

हो कि हम बेहतर हैं और बेहतर कर सकते हैं।  हमारे

 भीतर ही आशा व निराशा है, गम और खुशी है। हम

बाहर खुशी की तलाश में भटकते रहते हैं परंतु कभी ख़ुद

को तलाशने की रत्ती मात्र कोशिश भी नही की, जिस 

दिन हम अपने को तलाश लेंगे, ख़ुद को ख़ुद से मिलवा

देंगे , तब हमें परम सुख की प्राप्ति होगी।"

         मैं भी उस एक दिन की आस में हूँ, जब ख़ुद से 

ख़ुद को ही मिलवा सकूं।

                               हाँ

            "मैं भी उस एक दिन की आस में हूँ"

                                  

  -©पूर्णिमा तिवारी

       ब्लॉगर


                                           

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